भारतीय इतिहास

भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत कब हुई? पहला फोटो किसने खींचा था? जानिए कैमरे का पूरा इतिहास

By Pritam Kumar September 1, 2026 ⏱ 1 min read

आज के समय में मोबाइल निकालिए और कुछ ही सेकंड में फोटो तैयार हो जाती है। एक क्लिक में किसी व्यक्ति, जगह या यादगार पल को तस्वीर में कैद किया जा सकता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब मोबाइल तो दूर, आधुनिक कैमरे भी नहीं थे, तब तस्वीरें कैसे बनाई जाती थीं? भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत कब हुई और यहां पहली तस्वीर किसने खींची थी?

Table of Contents

  1. फोटोग्राफी से पहले तस्वीरें कैसे बनाई जाती थीं?
  2. दुनिया में फोटोग्राफी की शुरुआत कैसे हुई?
  3. भारत में फोटोग्राफी कब पहुंची?
  4. भारत की पहली तस्वीर किसने खींची थी?
  5. John McCosh का नाम क्यों महत्वपूर्ण है?
  6. 1840 के दशक की शुरुआती तस्वीरों में क्या दिखाई देता था?
  7. Frederick Fiebig का योगदान
  8. भारत के शुरुआती भारतीय फोटोग्राफर कौन थे?
  9. भारत में Photographic Societies की शुरुआत
  10. भारत में फोटो स्टूडियो का दौर कैसे शुरू हुआ?
  11. पहले फोटो खिंचवाना इतना खास क्यों था?
  12. भारत में फोटोग्राफी ने इतिहास को कैसे बदला?
  13. फोटोग्राफी से मोबाइल कैमरे तक का सफर
  14. World Photography Day क्यों मनाया जाता है?
  15. आज की फोटोग्राफी और 1840 की फोटोग्राफी में कितना अंतर है?
  16. निष्कर्ष

भारत में फोटोग्राफी के शुरुआती प्रमाण लगभग 1840 के आसपास मिलते हैं, जब डैग्यूरियोटाइप कैमरे और इस नई तकनीक से जुड़े प्रयोग भारत में शुरू हो चुके थे। यूरोप में डैग्यूरियोटाइप प्रक्रिया की सार्वजनिक घोषणा 1839 में हुई और इसके तुरंत बाद यह तकनीक भारत पहुंच गई। जनवरी 1840 तक कलकत्ता की Thacker, Spink & Co. डैग्यूरियोटाइप कैमरों की बिक्री का विज्ञापन कर रही थी।

इतना ही नहीं, मार्च 1840 तक कलकत्ता के समाचार पत्रों में भारत में बनाए गए शुरुआती डैग्यूरियोटाइप का उल्लेख मिलने लगता है। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि भारत में फोटोग्राफी के शुरुआती प्रयोग लगभग 1840 में शुरू हो चुके थे।

लेकिन भारत की पहली तस्वीर किसने खींची थी? इसका जवाब आज भी पूरी तरह निश्चित नहीं है। शुरुआती तस्वीरों में कुछ के फोटोग्राफर का नाम दर्ज नहीं है।

फोटोग्राफी से पहले तस्वीरें कैसे बनाई जाती थीं?

कैमरे और आधुनिक फोटोग्राफी के आने से पहले भी इंसान किसी दृश्य को रिकॉर्ड करने की कोशिश करता था। इसके लिए Camera Obscura जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था।

Camera Obscura क्या था?

Camera Obscura का अर्थ लगभग “अंधेरा कमरा” होता है। इसमें एक छोटे से छेद के माध्यम से बाहर की रोशनी अंदर आती थी और सामने की सतह पर बाहरी दृश्य की उल्टी छवि दिखाई देती थी।

यह तकनीक अपने आप कोई स्थायी तस्वीर नहीं बनाती थी। कलाकार इस दिखाई देने वाली छवि को देखकर कागज या दूसरी सतह पर उसका चित्र बना सकते थे।

इस तरह Camera Obscura ने दृश्य को एक सतह पर प्रोजेक्ट करने का तरीका दिया, लेकिन किसी दृश्य को स्थायी तस्वीर में बदलने के लिए प्रकाश और रसायनों से जुड़ी तकनीक का विकास जरूरी था।

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दुनिया में फोटोग्राफी की शुरुआत कैसे हुई?

19वीं सदी में वैज्ञानिकों और आविष्कारकों ने प्रकाश की मदद से स्थायी तस्वीर बनाने पर लगातार प्रयोग किए। इसी प्रयास के दौरान Daguerreotype प्रक्रिया विकसित हुई।

Daguerreotype क्या था?

Louis Daguerre से जुड़ी डैग्यूरियोटाइप प्रक्रिया की सार्वजनिक घोषणा 19 अगस्त 1839 को पेरिस में की गई। यह शुरुआती सफल photographic processes में से एक थी और इसने तस्वीर बनाने की दुनिया में बड़ा बदलाव ला दिया।

डैग्यूरियोटाइप में चांदी की परत वाली एक विशेष धातु प्लेट का इस्तेमाल किया जाता था। आज के डिजिटल कैमरे की तुलना में यह प्रक्रिया काफी जटिल थी।

प्लेट को तैयार करना, उसे प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाना और तस्वीर को विकसित करना पूरी प्रक्रिया का हिस्सा था। तस्वीर बनने के बाद उसे सावधानी से संभालना पड़ता था।

उस समय यह तकनीक लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

19 अगस्त और World Photography Day

डैग्यूरियोटाइप की सार्वजनिक घोषणा 19 अगस्त 1839 को हुई थी। इसी तारीख से आज मनाए जाने वाले World Photography Day का ऐतिहासिक संबंध जोड़ा जाता है।

भारत में फोटोग्राफी कब पहुंची?

फोटोग्राफी की नई तकनीक भारत तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा।

भारत में शुरुआती फोटोग्राफिक प्रयोग

1839 में डैग्यूरियोटाइप की घोषणा के बाद भारत में भी इस तकनीक को लेकर उत्सुकता पैदा हो गई। दिसंबर 1839 में Bombay Times में डैग्यूरियोटाइप के बारे में लेख प्रकाशित हुए।

इसके बाद जनवरी 1840 में कलकत्ता की Thacker, Spink & Co. ने डैग्यूरियोटाइप कैमरों की बिक्री का विज्ञापन किया। Getty के अभिलेख में भी इस विज्ञापन का उल्लेख मिलता है।

1840 के दशक का डैग्यूरियोटाइप कैमरा और शुरुआती फोटोग्राफी उपकरण

Science Museum Group के अनुसार भी डैग्यूरियोटाइप कैमरे 1840 में भारत में आयात किए गए थे।

इसलिए भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत के लिए लगभग 1840 एक महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है।

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भारत की पहली तस्वीर किसने खींची थी?

यह इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प सवाल है।

पहली तस्वीर के फोटोग्राफर का नाम क्यों स्पष्ट नहीं है?

इंटरनेट पर कई जगह किसी एक व्यक्ति को “भारत का पहला फोटोग्राफर” या “भारत की पहली तस्वीर लेने वाला व्यक्ति” बताया जाता है। लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ऐसा निश्चित दावा करना उचित नहीं है।

मार्च 1840 में कलकत्ता के Calcutta Courier में ऐसे डैग्यूरियोटाइप के प्रदर्शन का उल्लेख मिलता है जिन्हें भारत में बने शुरुआती डैग्यूरियोटाइप माना जाता है। इनमें कलकत्ता के Esplanade और आसपास के दृश्यों का उल्लेख मिलता है।

Science Museum Group के संग्रह में भी 1840–1868 के बीच कलकत्ता में बना एक डैग्यूरियोटाइप दर्ज है, लेकिन उसके photographer को Unknown बताया गया है।

इसलिए ऐतिहासिक रूप से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है:

भारत की सबसे पहली तस्वीर किस व्यक्ति ने खींची थी, इसका निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। भारत में शुरुआती डैग्यूरियोटाइप फोटोग्राफी का प्रमाण लगभग 1840 में कलकत्ता से मिलता है।

John McCosh का नाम क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत की शुरुआती ज्ञात और किसी नाम से जुड़े फोटोग्राफिक कार्यों में John McCosh का नाम महत्वपूर्ण है।

John McCosh कौन थे?

John McCosh ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से जुड़े एक सर्जन थे और शुरुआती दौर में फोटोग्राफी का प्रयोग करने वाले महत्वपूर्ण लोगों में शामिल थे।

उन्होंने 1848–49 के दूसरे सिख युद्ध के दौरान भारत में तस्वीरें बनाईं। उनके काम में पंजाब और लाहौर से जुड़े लोगों, स्थानों और घटनाओं का दृश्य रिकॉर्ड मिलता है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि John McCosh को भारत का पहला फोटोग्राफर कहना सही नहीं होगा। उनका महत्व इस बात में है कि उनके नाम से जुड़े शुरुआती फोटोग्राफिक कार्य आज ऐतिहासिक रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

1840 के दशक की शुरुआती तस्वीरों में क्या दिखाई देता था?

शुरुआती फोटोग्राफरों के लिए भारत अपने शहरों, इमारतों, बाजारों, लोगों और प्राकृतिक दृश्यों के कारण बेहद आकर्षक था।

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कलकत्ता की शुरुआती तस्वीरें

कलकत्ता शुरुआती भारतीय फोटोग्राफी का एक प्रमुख केंद्र बन गया था। यहां के भवन, सड़कें, सार्वजनिक स्थान और दैनिक जीवन फोटोग्राफरों के महत्वपूर्ण विषय बने।

19वीं सदी के कलकत्ता में शुरुआती फोटोग्राफी का ऐतिहासिक दृश्य

Metropolitan Museum of Art के संग्रह में लगभग 1845 की “Women Grinding Paint, Calcutta” नामक डैग्यूरियोटाइप मौजूद है। यह भारत में शुरुआती फोटोग्राफी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

ऐसी तस्वीरें आज केवल कला की वस्तुएं नहीं हैं। वे 19वीं सदी के भारतीय समाज और शहरों को समझने के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी हैं।

Frederick Fiebig का योगदान

भारत में शुरुआती फोटोग्राफी के इतिहास में Frederick Fiebig का नाम भी महत्वपूर्ण है।

1847 में कलकत्ता का दस्तावेजीकरण

Fiebig के 1840 के दशक के काम में कलकत्ता के दृश्यों का महत्वपूर्ण photographic record मिलता है। उनके लगभग 1847 के कलकत्ता संबंधी panoramic photographs शुरुआती भारतीय photographic documentation के महत्वपूर्ण उदाहरणों में शामिल हैं।

इन तस्वीरों में उस समय के शहर, इमारतों और आसपास के वातावरण की झलक मिलती है।

आज ऐसे फोटोग्राफ इतिहासकारों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे 19वीं सदी के भारत के दृश्य प्रमाण उपलब्ध कराते हैं।

भारत के शुरुआती भारतीय फोटोग्राफर कौन थे?

फोटोग्राफी के शुरुआती वर्षों में भारत में इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों, ब्रिटिश अधिकारियों और संपन्न वर्ग द्वारा किया जाता था।

धीरे-धीरे भारतीय लोगों ने भी फोटोग्राफी को अपनाना शुरू किया।

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Ahmad Ali Khan

शुरुआती भारतीय डैग्यूरियोटाइप फोटोग्राफरों में Ahmad Ali Khan का नाम महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत में शुरुआती भारतीय फोटोग्राफरों की संख्या कम थी, लेकिन समय के साथ भारतीयों ने इस तकनीक को अपनाकर अपने स्टूडियो और व्यवसाय स्थापित किए।

यह बदलाव महत्वपूर्ण था क्योंकि फोटोग्राफी धीरे-धीरे केवल यूरोपीय लोगों की तकनीक न रहकर भारतीय समाज का भी हिस्सा बनने लगी।

भारत में Photographic Societies की शुरुआत

जैसे-जैसे फोटोग्राफी लोकप्रिय हुई, इसे सीखने और बढ़ावा देने के लिए photographic societies भी बनने लगीं।

Photographic Society of Bombay

Photographic Society of Bombay की स्थापना 1854 में हुई थी। यह ब्रिटिश भारत में स्थापित शुरुआती संगठित photographic societies में से एक थी और इसे भारत की पहली ऐसी संस्था माना जाता है। इसका उद्देश्य फोटोग्राफी में रुचि रखने वालों को एक मंच देना और तस्वीरों व तकनीकों पर विचार-विमर्श को बढ़ावा देना था।

Photographic Society of Madras

Photographic Society of Madras की स्थापना 1857 में Dr. Alexander Hunter और Walter Elliot से जुड़े प्रयासों के साथ हुई। इसके माध्यम से फोटोग्राफरों को एक मंच मिला और exhibitions तथा photographic activities को बढ़ावा मिला।

इस दौर तक भारत में फोटोग्राफी एक गंभीर तकनीकी और कलात्मक गतिविधि के रूप में विकसित हो चुकी थी।

भारत में फोटो स्टूडियो का दौर कैसे शुरू हुआ?

जैसे-जैसे फोटोग्राफी की तकनीक विकसित हुई और लोगों की रुचि बढ़ी, फोटो खिंचवाने का व्यवसाय भी विकसित होने लगा।

फोटोग्राफी एक व्यवसाय के रूप में

1840 के दशक के अंत और उसके बाद भारत के प्रमुख शहरों में photographic studios और commercial photography का विस्तार हुआ। कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे शहर इस विकास के महत्वपूर्ण केंद्र बने।

राजाओं और नवाबों से लेकर व्यापारी, अधिकारी और संपन्न परिवार तक फोटो खिंचवाने लगे।

पुराने स्टूडियो में विशेष पृष्ठभूमि, कुर्सियां, पर्दे और सजावटी सामान लगाए जाते थे। व्यक्ति को एक निश्चित मुद्रा में बैठाया जाता था ताकि तस्वीर स्पष्ट और आकर्षक बने।

उस समय फोटो खिंचवाना आज की तरह रोजमर्रा की गतिविधि नहीं था। यह अक्सर एक विशेष अवसर माना जाता था।

पहले फोटो खिंचवाना इतना खास क्यों था?

आज हम एक दिन में दर्जनों या सैकड़ों तस्वीरें खींच सकते हैं। लेकिन 19वीं सदी में फोटो खिंचवाना काफी अलग अनुभव था।

पुराने कैमरों में क्या मुश्किल थी?

कैमरे और photographic materials महंगे थे। तस्वीर बनाने के लिए विशेष प्लेट, रसायन, उचित रोशनी और काफी सावधानी की जरूरत पड़ती थी।

फोटो खिंचवाने वाले व्यक्ति को भी काफी देर तक स्थिर रहना पड़ सकता था। थोड़ी-सी हलचल तस्वीर की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती थी।

इसी वजह से पुराने फोटोग्राफ में लोगों के चेहरे अक्सर गंभीर दिखाई देते हैं।

इसका मतलब यह नहीं था कि वे दुखी थे। कई बार उन्हें तस्वीर के दौरान केवल स्थिर रहना पड़ता था।

भारत में फोटोग्राफी ने इतिहास को कैसे बदला?

फोटोग्राफी ने भारत के इतिहास को दर्ज करने का तरीका बदल दिया।

इतिहास को तस्वीरों में सुरक्षित करना

फोटोग्राफी से पहले किसी राजा, व्यक्ति, इमारत या शहर का दृश्य रिकॉर्ड करने के लिए चित्रकारों और कलाकारों पर निर्भर रहना पड़ता था।

फोटोग्राफी ने वास्तविक दृश्यों को एक नए तकनीकी माध्यम से रिकॉर्ड करने का अवसर दिया।

19वीं सदी में भारत के शहरों, स्मारकों, वास्तुकला, राजघरानों, लोगों और सामाजिक जीवन की बड़ी संख्या में तस्वीरें बनाई गईं।

इन तस्वीरों ने इतिहासकारों को उस समय के शहरों, कपड़ों, वास्तुकला और सामाजिक जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण दृश्य प्रमाण दिए।

औपनिवेशिक दौर में फोटोग्राफी की भूमिका

हालांकि फोटोग्राफी का उपयोग केवल कला और निजी यादों के लिए नहीं हुआ। औपनिवेशिक दौर में इसका इस्तेमाल प्रशासनिक, सर्वेक्षण, वास्तुकला और ethnographic documentation के लिए भी किया गया।

इसलिए शुरुआती भारतीय फोटोग्राफी को समझते समय यह याद रखना जरूरी है कि कैमरा उस समय केवल एक artistic tool नहीं था, बल्कि colonial documentation का भी हिस्सा था।

आज वही पुरानी तस्वीरें हमें उस समय के भारत को दृश्य रूप में समझने में मदद करती हैं।

फोटोग्राफी से मोबाइल कैमरे तक का सफर

भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत डैग्यूरियोटाइप जैसी कठिन और महंगी प्रक्रिया से हुई थी।

समय के साथ फोटोग्राफी की तकनीक लगातार आसान, तेज और अधिक सुलभ होती गई।

फोटोग्राफी के विकास की प्रमुख कड़ियां

  • डैग्यूरियोटाइप
  • पेपर फोटोग्राफी
  • ग्लास प्लेट प्रक्रियाएं
  • फिल्म कैमरे
  • इंस्टेंट कैमरे
  • SLR कैमरे
  • डिजिटल कैमरे
  • DSLR कैमरे
  • स्मार्टफोन कैमरे

आज स्मार्टफोन की वजह से कैमरा लगभग हर व्यक्ति की जेब में मौजूद है।

एक समय जिस काम के लिए विशेष उपकरण, रसायन और लंबी तैयारी की जरूरत पड़ती थी, वही काम आज कुछ सेकंड में हो जाता है।

World Photography Day क्यों मनाया जाता है?

हर साल 19 अगस्त को World Photography Day मनाया जाता है।

19 अगस्त का इतिहास

इस तारीख का संबंध 19 अगस्त 1839 को फ्रांस में डैग्यूरियोटाइप प्रक्रिया की सार्वजनिक घोषणा से है।

यह दिन फोटोग्राफी की तकनीक, कला और इतिहास को याद करने का अवसर देता है।

भारत में भी यह दिन विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश की फोटोग्राफी की कहानी 19वीं सदी के शुरुआती वर्षों में ही शुरू हो गई थी।

आज की फोटोग्राफी और 1840 की फोटोग्राफी में कितना अंतर है?

अगर 1840 के आसपास की फोटोग्राफी और आज के smartphone camera को देखें तो दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है।

1840 के आसपास

  • कैमरे भारी और महंगे थे।
  • Photographic plates तैयार करनी पड़ती थीं।
  • विशेष रसायनों की आवश्यकता होती थी।
  • तस्वीर बनाने की प्रक्रिया जटिल थी।
  • फोटो लेने के लिए काफी तैयारी करनी पड़ती थी।
  • तस्वीरों को सुरक्षित रखना भी चुनौतीपूर्ण था।

आज

  • कैमरा मोबाइल में मौजूद है।
  • तस्वीर तुरंत दिखाई देती है।
  • हजारों तस्वीरें आसानी से स्टोर की जा सकती हैं।
  • फोटो को तुरंत edit और share किया जा सकता है।
  • AI की मदद से तस्वीरों में कई तरह के बदलाव भी किए जा सकते हैं।

यानी करीब दो शताब्दियों में फोटोग्राफी ने एक लंबा सफर तय किया है।

निष्कर्ष

भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत किसी एक व्यक्ति या एक निश्चित तारीख से जोड़ना पूरी तरह सही नहीं होगा। उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि लगभग 1840 तक डैग्यूरियोटाइप कैमरे भारत में पहुंच चुके थे और कलकत्ता में शुरुआती डैग्यूरियोटाइप तस्वीरें बनाई जा रही थीं।

भारत की सबसे पहली तस्वीर किस व्यक्ति ने खींची थी, इसका निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। शुरुआती रिकॉर्ड में कुछ तस्वीरों के फोटोग्राफर अज्ञात हैं।

इसके बाद John McCosh जैसे शुरुआती फोटोग्राफरों ने भारत के लोगों, स्थानों और घटनाओं को कैमरे में दर्ज किया। Frederick Fiebig ने भी 1840 के दशक में कलकत्ता के महत्वपूर्ण दृश्य रिकॉर्ड किए। वहीं भारतीय फोटोग्राफरों ने धीरे-धीरे इस तकनीक को अपनाना शुरू किया।

1850 के दशक में photographic societies के गठन और commercial studios के विस्तार ने भारत में फोटोग्राफी को एक संगठित गतिविधि और व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाया।

आज हम मोबाइल से एक क्लिक में फोटो ले लेते हैं, लेकिन फोटोग्राफी की शुरुआती दुनिया बिल्कुल अलग थी।

भारत में फोटोग्राफी की कहानी सिर्फ कैमरे के इतिहास की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस तकनीकी बदलाव की कहानी है जिसने भारत के इतिहास, समाज, लोगों, इमारतों और संस्कृति को तस्वीरों में सुरक्षित कर दिया।

Frequently Asked Questions

भारत में फोटोग्राफी के शुरुआती प्रमाण लगभग 1840 के आसपास मिलते हैं। इसी समय कलकत्ता में डैग्यूरियोटाइप कैमरे उपलब्ध होने लगे और शुरुआती फोटोग्राफिक प्रयोग शुरू हुए।

भारत की सबसे पहली तस्वीर लेने वाले व्यक्ति का नाम निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। लगभग 1840 के शुरुआती डैग्यूरियोटाइप फोटोग्राफ में कुछ के फोटोग्राफर अज्ञात हैं।

डैग्यूरियोटाइप कैमरे लगभग 1840 में भारत पहुंच चुके थे। कलकत्ता में Thacker, Spink & Co. द्वारा इन कैमरों की बिक्री के विज्ञापन भी प्रकाशित हुए थे।

भारत में शुरुआती फोटोग्राफी के महत्वपूर्ण प्रमाण कलकत्ता से मिलते हैं। लगभग 1840 में यहां डैग्यूरियोटाइप कैमरों और शुरुआती तस्वीरों के प्रमाण मौजूद हैं।

डैग्यूरियोटाइप 19वीं सदी की शुरुआती सफल फोटोग्राफिक प्रक्रियाओं में से एक थी। इसमें चांदी की परत वाली विशेष धातु प्लेट पर तस्वीर बनाई जाती थी।

John McCosh, Frederick Fiebig और Ahmad Ali Khan भारत की शुरुआती फोटोग्राफी के महत्वपूर्ण नामों में शामिल हैं। हालांकि इनमें से किसी को भी पर्याप्त प्रमाण के बिना भारत का पहला फोटोग्राफर कहना सही नहीं है।

John McCosh ने 1848–49 के दूसरे सिख युद्ध के दौरान भारत में तस्वीरें बनाईं। उनके फोटोग्राफ भारत की शुरुआती ज्ञात फोटोग्राफी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

Frederick Fiebig भारत में शुरुआती फोटोग्राफरों में महत्वपूर्ण नाम थे। उन्होंने 1840 के दशक में कलकत्ता के शहर और आसपास के दृश्यों का फोटोग्राफिक रिकॉर्ड तैयार किया।

शुरुआती तस्वीरों में कलकत्ता जैसे शहरों की इमारतें, सड़कें, सार्वजनिक स्थान, लोग और आसपास के दृश्य दिखाई देते थे। बाद में युद्ध, स्मारक, राजघराने और सामाजिक जीवन भी फोटोग्राफी के महत्वपूर्ण विषय बने।

Photographic Society of Bombay की स्थापना 1854 में हुई थी। यह भारत की शुरुआती संगठित photographic societies में से एक थी और इसने फोटोग्राफी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में फोटोग्राफी की शुरुआत कब हुई? पहला फोटो किसने खींचा था? जानिए कैमरे का पूरा इतिहास

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Pritam Kumar

नमस्कार, मेरा नाम प्रीतम कुमार है। मैं एक डिजिटल उद्यमी, ब्लॉगर और कंटेंट क्रिएटर हूँ। मुझे टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सिक्योरिटी, इंटरनेट, डिजिटल मार्केटिंग, ऑनलाइन बिजनेस और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर रिसर्च करना और लेख लिखना पसंद है।

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