भारत सदियों से ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है। जब दुनिया के कई हिस्सों में संगठित शिक्षा व्यवस्था विकसित भी नहीं हुई थी, तब भारत में ऐसे विश्वविद्यालय मौजूद थे जहाँ देश-विदेश से विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने आते थे। इन्हीं में सबसे प्रसिद्ध नाम नालंदा विश्वविद्यालय का है, जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन और महान आवासीय विश्वविद्यालयों में गिना जाता है।
Table of Contents
- नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ स्थित है?
- नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कब और किसने की?
- नालंदा विश्वविद्यालय क्यों प्रसिद्ध था?
- नालंदा विश्वविद्यालय में कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते थे?
- नालंदा विश्वविद्यालय का विशाल पुस्तकालय
- नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश कैसे मिलता था?
- नालंदा विश्वविद्यालय में किन देशों से छात्र आते थे?
- नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश कैसे हुआ?
- आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय और इसकी विरासत
- निष्कर्ष
बिहार के नालंदा जिले में स्थित यह विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं था, बल्कि ज्ञान, शोध और बौद्धिक विकास का वैश्विक केंद्र था। यहाँ भारत के अलावा चीन, तिब्बत, कोरिया, जापान, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों से छात्र और विद्वान अध्ययन करने आते थे। नालंदा में दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, व्याकरण, तर्कशास्त्र और बौद्ध अध्ययन जैसे अनेक विषय पढ़ाए जाते थे। इसकी विशाल पुस्तकालय और कठिन प्रवेश परीक्षा इसे अपने समय का सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय बनाती थीं।
हालाँकि 12वीं शताब्दी के अंत में हुए विनाश ने इस महान विश्वविद्यालय को इतिहास का हिस्सा बना दिया, लेकिन इसकी विरासत आज भी पूरी दुनिया को प्रेरित करती है। आधुनिक समय में नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्निर्माण भारत की उस प्राचीन ज्ञान परंपरा को फिर से जीवित करने का प्रयास है।
इस लेख में हम नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास, इसकी स्थापना, शिक्षा व्यवस्था, प्रसिद्ध पुस्तकालय, विनाश, पुनर्निर्माण और इससे जुड़े रोचक तथ्यों को विस्तार से जानेंगे।
नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ स्थित है?
नालंदा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य के नालंदा जिले में स्थित है। यह ऐतिहासिक स्थल बिहार की राजधानी पटना से लगभग 90 किलोमीटर और राजगीर से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र शिक्षा, संस्कृति और बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र माना जाता था। आज भी यहाँ मौजूद प्राचीन खंडहर उस गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय का परिसर अपने समय में अत्यंत विशाल और सुव्यवस्थित था। लाल ईंटों से निर्मित इमारतें, विशाल अध्ययन कक्ष, छात्रावास, मंदिर, उद्यान और पुस्तकालय इसे विश्व के सबसे उन्नत शिक्षा संस्थानों में शामिल करते थे। पुरातात्विक खुदाई में यहाँ से अनेक मठ (विहार), स्तूप, प्रार्थना स्थल, कक्षाएँ और हजारों प्राचीन अवशेष मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र ही नहीं, बल्कि शोध और आध्यात्मिक अध्ययन का भी प्रमुख स्थान था।
इतिहासकारों के अनुसार, नालंदा की भौगोलिक स्थिति भी इसकी लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण थी। यह उस समय के प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों के निकट स्थित था, जिससे भारत और विदेशों से आने वाले विद्यार्थियों एवं विद्वानों के लिए यहाँ पहुँचना अपेक्षाकृत आसान था।
नालंदा विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2016 में इसके पुरातात्विक अवशेषों को UNESCO द्वारा विश्व धरोहर (World Heritage Site) का दर्जा दिया गया। इसके बाद इस स्थल के संरक्षण और वैश्विक पहचान को और अधिक मजबूती मिली। आज यहाँ हर वर्ष भारत और विदेशों से हजारों पर्यटक, इतिहास प्रेमी, शोधकर्ता और छात्र इसकी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और स्थापत्य कला को देखने आते हैं।
यदि आप भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को करीब से समझना चाहते हैं, तो नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष निश्चित रूप से देखने योग्य स्थानों में से एक हैं।

रोचक तथ्य: नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन अवशेष लगभग 23 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं, जबकि माना जाता है कि इसका वास्तविक परिसर इससे भी कहीं अधिक विशाल था।
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कब और किसने की?
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 450–470 ई.) के दौरान गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने करवाई थी। इतिहासकारों के अनुसार, कुमारगुप्त ने इस विश्वविद्यालय की नींव रखी, जबकि बाद के शासकों ने इसके विस्तार और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से हर्षवर्धन और पाल वंश के राजाओं ने नालंदा को आर्थिक सहायता प्रदान की, जिससे यह समय के साथ विश्व के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों में बदल गया।
‘नालंदा’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई मत हैं। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, यह संस्कृत के शब्द ‘नालम्’ (ज्ञान) और ‘दा’ (देने वाला) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “ज्ञान प्रदान करने वाला”। यह नाम विश्वविद्यालय के उद्देश्य और उसकी महान शिक्षा परंपरा को दर्शाता है।
शुरुआत में नालंदा मुख्य रूप से बौद्ध अध्ययन का केंद्र था, लेकिन समय के साथ यहाँ केवल धार्मिक शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहा। गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, व्याकरण, दर्शन, तर्कशास्त्र और साहित्य जैसे अनेक विषयों की उच्च शिक्षा भी दी जाने लगी। यही कारण था कि भारत ही नहीं, बल्कि एशिया के कई देशों से विद्यार्थी और विद्वान यहाँ अध्ययन करने आते थे।
लगातार कई शताब्दियों तक राजाओं के संरक्षण, उत्कृष्ट शिक्षकों और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के कारण नालंदा विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की। उस समय यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वैश्विक केंद्र बन चुका था.
नालंदा विश्वविद्यालय क्यों प्रसिद्ध था?
नालंदा विश्वविद्यालय अपने समय का केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय ज्ञान और शोध का केंद्र था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ भारत के साथ-साथ चीन, तिब्बत, कोरिया, जापान, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों से विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने आते थे। इससे नालंदा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, विश्वविद्यालय में एक समय लगभग 10,000 विद्यार्थी और करीब 2,000 आचार्य एवं विद्वान अध्ययन और अध्यापन से जुड़े थे। विद्यार्थियों के लिए छात्रावास, भोजन और शिक्षा की व्यवस्था निःशुल्क थी, जिसका खर्च राजाओं और दानदाताओं द्वारा वहन किया जाता था।
नालंदा में प्रवेश लेना आसान नहीं था। नए विद्यार्थियों को प्रवेश से पहले विद्वान आचार्यों द्वारा आयोजित कठिन मौखिक परीक्षा पास करनी पड़ती थी। माना जाता है कि केवल योग्य और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को ही प्रवेश मिलता था। यही कारण था कि यहाँ अध्ययन करना सम्मान की बात मानी जाती थी।
विश्वविद्यालय में केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि वाद-विवाद, शोध, तर्क-वितर्क और व्यावहारिक शिक्षा पर भी विशेष जोर दिया जाता था। विभिन्न देशों के विद्वानों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था, जिससे नालंदा उस समय ज्ञान और संस्कृति के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ।
इसी उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था, कठिन प्रवेश प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के कारण नालंदा विश्वविद्यालय को प्राचीन भारत का सबसे महान विश्वविद्यालय माना जाता है।
रोचक तथ्य: चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने कई वर्षों तक नालंदा में अध्ययन किया और अपने यात्रा-वृत्तांत में इसकी शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और विद्वानों की विस्तार से प्रशंसा की।
नालंदा विश्वविद्यालय में कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते थे?
हालाँकि नालंदा विश्वविद्यालय को बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है, लेकिन यहाँ शिक्षा केवल धर्म तक सीमित नहीं थी। यह एक बहुविषयक (Multidisciplinary) विश्वविद्यालय था, जहाँ विज्ञान, दर्शन, भाषा और चिकित्सा सहित कई विषयों की उच्च शिक्षा दी जाती थी। विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि शोध, तर्क-वितर्क और व्यावहारिक अध्ययन के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था।
नीचे दी गई तालिका में नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख विषयों की जानकारी दी गई है।
| विषय | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| बौद्ध दर्शन | महायान और हीनयान बौद्ध परंपराओं का अध्ययन |
| व्याकरण | संस्कृत भाषा और व्याकरण का गहन अध्ययन |
| तर्कशास्त्र | वाद-विवाद, तर्क और विश्लेषण की शिक्षा |
| गणित | अंकगणित और गणितीय सिद्धांत |
| खगोल विज्ञान | ग्रहों, नक्षत्रों और समय गणना का अध्ययन |
| आयुर्वेद | चिकित्सा विज्ञान और औषधि संबंधी ज्ञान |
| दर्शनशास्त्र | भारतीय दर्शन की विभिन्न शाखाएँ |
| साहित्य | संस्कृत एवं प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन |
इन विषयों के अध्ययन के लिए अनुभवी आचार्य विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते थे। नियमित व्याख्यान, समूह चर्चा और शास्त्रार्थ के माध्यम से विद्यार्थियों के ज्ञान और तर्कशक्ति का विकास किया जाता था। यही कारण था कि नालंदा से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्वानों को अपने समय में अत्यंत सम्मान प्राप्त था।
नालंदा की यही बहुविषयक शिक्षा प्रणाली आज के आधुनिक विश्वविद्यालयों के लिए भी प्रेरणा मानी जाती है, जहाँ विभिन्न विषयों का एक साथ अध्ययन और शोध किया जाता है।
नालंदा विश्वविद्यालय का विशाल पुस्तकालय
नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय प्राचीन विश्व के सबसे बड़े और समृद्ध पुस्तकालयों में से एक माना जाता था। यह केवल विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का स्थान नहीं था, बल्कि शोध, ज्ञान के संरक्षण और नई खोजों का प्रमुख केंद्र भी था। यहाँ भारत और विदेशों से आए विद्वान विभिन्न विषयों पर उपलब्ध दुर्लभ ग्रंथों का अध्ययन करते थे।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, नालंदा के पुस्तकालय को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया था—रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक। इनमें धर्म, दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, व्याकरण, साहित्य और अन्य विषयों से संबंधित हजारों दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियाँ सुरक्षित रखी जाती थीं। उस समय मुद्रण तकनीक विकसित नहीं हुई थी, इसलिए अधिकांश ग्रंथ ताड़पत्र और भोजपत्र पर हाथ से लिखे जाते थे।
यह पुस्तकालय नालंदा विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पहचान था। यहाँ के आचार्य और विद्यार्थी लगातार नए ग्रंथों का अध्ययन, लेखन और संरक्षण करते थे, जिससे ज्ञान की समृद्ध परंपरा आगे बढ़ती रही। विदेशी यात्रियों ने भी अपने यात्रा-वृत्तांतों में इस विशाल पुस्तकालय और उसकी दुर्लभ पांडुलिपियों का उल्लेख किया है।
दुर्भाग्यवश, 12वीं शताब्दी के अंत में नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश के दौरान यह अमूल्य पुस्तकालय भी नष्ट हो गया। इसके साथ ही प्राचीन भारत के अनगिनत दुर्लभ ग्रंथ और ज्ञान का विशाल भंडार हमेशा के लिए खो गया। आज भी नालंदा का पुस्तकालय भारतीय शिक्षा इतिहास की सबसे महान धरोहरों में से एक माना जाता है।

| वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 5वीं शताब्दी | स्थापना |
| 7वीं शताब्दी | स्वर्णकाल |
| 1193 ई. | विनाश |
| 2016 | UNESCO विश्व धरोहर |
| वर्तमान | आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय |
ध्यान दें: यह लोकप्रिय दावा कि पुस्तकालय कई महीनों तक जलता रहा, व्यापक रूप से दोहराया जाता है, लेकिन इसे निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाणों से पूरी तरह सिद्ध नहीं माना जाता। इसलिए इस तथ्य को सावधानी से प्रस्तुत करना बेहतर है।
नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश कैसे मिलता था?
नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करना आसान नहीं था। उस समय भी यहाँ एक कठोर चयन प्रक्रिया अपनाई जाती थी, जिसके कारण केवल योग्य और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को ही अध्ययन का अवसर मिलता था। यही व्यवस्था नालंदा की उच्च शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
ऐतिहासिक विवरणों, विशेषकर चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा-वृत्तांतों से पता चलता है कि प्रवेश से पहले विद्यार्थियों की मौखिक परीक्षा ली जाती थी। यह परीक्षा विश्वविद्यालय के विद्वान आचार्य या द्वार पर नियुक्त शिक्षक लेते थे। इसमें अभ्यर्थियों के ज्ञान, तर्कशक्ति और विषय की समझ का परीक्षण किया जाता था।
जो विद्यार्थी इस परीक्षा में सफल होते थे, उन्हें ही विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलता था। प्रवेश के बाद छात्रों को आवास, भोजन और शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती थी, जिससे वे पूरी तरह अध्ययन और शोध पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यही कारण था कि नालंदा में अध्ययन करना उस समय अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता था।
नालंदा की यह चयन प्रक्रिया दर्शाती है कि प्राचीन भारत में भी शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन और योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। इसी कारण यह विश्वविद्यालय कई शताब्दियों तक दुनिया के सबसे सम्मानित शिक्षा केंद्रों में शामिल रहा।
नालंदा विश्वविद्यालय में किन देशों से छात्र आते थे?
नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं थी। अपनी उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था और विद्वान आचार्यों के कारण यह एशिया के कई देशों के विद्यार्थियों और भिक्षुओं के लिए प्रमुख अध्ययन केंद्र बन चुका था। उस समय विभिन्न देशों से छात्र यहाँ उच्च शिक्षा, बौद्ध दर्शन और अन्य विषयों का अध्ययन करने आते थे।
| देश | उद्देश्य |
|---|---|
| चीन | बौद्ध दर्शन और संस्कृत का अध्ययन |
| तिब्बत | धार्मिक शिक्षा और ग्रंथों का अध्ययन |
| कोरिया | बौद्ध धर्म एवं दर्शन |
| जापान | बौद्ध साहित्य और संस्कृति |
| श्रीलंका | बौद्ध शिक्षा और शोध |
| नेपाल | दर्शन और धार्मिक अध्ययन |
| इंडोनेशिया | बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान परंपरा |
| मध्य एशिया के कुछ क्षेत्र | उच्च शिक्षा और सांस्कृतिक अध्ययन |
विदेशी विद्यार्थियों की उपस्थिति ने नालंदा को एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय का स्वरूप दिया था। यहाँ विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं का आदान-प्रदान होता था, जिससे ज्ञान का दायरा और अधिक व्यापक बनता गया। शिक्षा पूरी करने के बाद कई छात्र अपने-अपने देशों में लौटकर भारतीय ज्ञान, बौद्ध दर्शन और संस्कृति का प्रसार करते थे।
इसी वैश्विक प्रभाव के कारण नालंदा विश्वविद्यालय को प्राचीन भारत की सबसे बड़ी शैक्षणिक उपलब्धियों में गिना जाता है। आज भी इसे दुनिया के शुरुआती अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्रों में से एक माना जाता है।

नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश कैसे हुआ?
नालंदा विश्वविद्यालय का पतन भारतीय इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक माना जाता है। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 1193 ईस्वी में तुर्क सेनापति बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय को भारी क्षति पहुँचाई। इस हमले में विश्वविद्यालय के कई भवन, मठ और पुस्तकालय नष्ट हो गए, जिससे सदियों से संचित ज्ञान की अमूल्य धरोहर का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए खो गया।
उस समय नालंदा केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि हजारों विद्यार्थियों, आचार्यों और शोधकर्ताओं का निवास स्थान भी था। आक्रमण के बाद विश्वविद्यालय की शिक्षा व्यवस्था लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई और अनेक विद्वानों को अन्य क्षेत्रों में जाना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप नालंदा की वह गौरवशाली परंपरा, जो कई शताब्दियों तक दुनिया को ज्ञान प्रदान करती रही थी, धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
हालाँकि, नालंदा के विनाश से जुड़ी कुछ लोकप्रिय कहानियाँ—जैसे पुस्तकालय का कई महीनों तक लगातार जलना—लोककथाओं और बाद की परंपराओं में व्यापक रूप से मिलती हैं, लेकिन इनके समर्थन में निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं। इसलिए इतिहास को समझते समय प्रमाणित तथ्यों और लोकप्रिय मान्यताओं के बीच अंतर करना आवश्यक है।
आज नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष हमें यह याद दिलाते हैं कि ज्ञान और शिक्षा किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति होती है। इन्हें संरक्षित करना केवल इतिहास की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी आवश्यक है।
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| स्थान | बिहार |
| स्थापना | 5वीं शताब्दी |
| संस्थापक | कुमारगुप्त प्रथम |
| प्रसिद्धि | विश्व का प्राचीन शिक्षा केंद्र |
| UNESCO | 2016 |
आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय और इसकी विरासत
सदियों तक खंडहरों में बदलने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की दिशा में 21वीं सदी में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। भारत सरकार और कई एशियाई देशों के सहयोग से आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य प्राचीन नालंदा की ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा और शोध के साथ आगे बढ़ाना है। यह विश्वविद्यालय बिहार के राजगीर के निकट स्थित है और विभिन्न देशों के विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं को उच्च शिक्षा प्रदान करता है।
आज का नालंदा विश्वविद्यालय इतिहास, पर्यावरण, बौद्ध अध्ययन, अंतरराष्ट्रीय संबंध और सतत विकास जैसे विषयों पर शोध और शिक्षा का केंद्र बन रहा है। यहाँ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, बहुविषयक शिक्षा और वैश्विक दृष्टिकोण पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे यह प्राचीन नालंदा की भावना को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
नालंदा विश्वविद्यालय की विरासत केवल इसके प्राचीन भवनों या अवशेषों तक सीमित नहीं है। यह भारत की उस समृद्ध शिक्षा परंपरा का प्रतीक है, जहाँ ज्ञान को सबसे बड़ा धन माना जाता था। इसकी कहानी हमें बताती है कि शिक्षा, शोध और विचारों का आदान-प्रदान किसी भी समाज की प्रगति का आधार होता है।
आज भी नालंदा का नाम दुनिया भर में सम्मान के साथ लिया जाता है। यह विश्वविद्यालय भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान की उस अमूल्य धरोहर का प्रतीक है, जिसने सदियों पहले विश्व को शिक्षा का नया मार्ग दिखाया।

Frequently Asked Questions
इतिहासकारों के अनुसार, नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने करवाई थी। बाद में हर्षवर्धन और पाल वंश के शासकों ने इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के नालंदा जिले में स्थित है। इसके प्राचीन अवशेष राजगीर के पास मौजूद हैं और यह स्थान आज UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।
नालंदा विश्वविद्यालय अपनी उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था, विशाल पुस्तकालय, कठिन प्रवेश प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध था। यहाँ कई देशों से छात्र अध्ययन करने आते थे।
यहाँ बौद्ध दर्शन, गणित, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, व्याकरण, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, साहित्य और अन्य कई विषयों की उच्च शिक्षा दी जाती थी।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, नालंदा विश्वविद्यालय में एक समय लगभग 10,000 विद्यार्थी और करीब 2,000 आचार्य अध्ययन एवं अध्यापन से जुड़े थे।
नालंदा का पुस्तकालय प्राचीन विश्व के सबसे बड़े पुस्तकालयों में गिना जाता था। इसमें हजारों दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियाँ सुरक्षित रखी जाती थीं, जिनका अध्ययन देश-विदेश के विद्वान करते थे।
अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 1193 ईस्वी में तुर्क सेनापति बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय को भारी क्षति पहुँची, जिसके बाद इसका पतन हो गया।
नालंदा विश्व के सबसे प्राचीन आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था। हालांकि, इससे पहले तक्षशिला भी एक प्रसिद्ध प्राचीन शिक्षा केंद्र था। दोनों का भारतीय शिक्षा इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।
नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन अवशेषों को वर्ष 2016 में UNESCO द्वारा विश्व धरोहर (World Heritage Site) का दर्जा दिया गया।
प्राचीन विश्वविद्यालय की विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 2010 के अधिनियम के तहत की गई और बाद के वर्षों में शैक्षणिक गतिविधियाँ शुरू हुईं। आज यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है।